Hindi Sahitya : Paramparagat vivaad Ewam Naye Samadhaan (Hardbound)

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About the Book 

हिन्दी समीक्षा का सूत्रपात ही विभिन्न विवादों से हुआ—आरम्भ में लाला श्री निवासदास के संयोगिता स्वयंवर नाटक की महत्ता को लेकर आलोचकों में वाद-विवाद छिड़ गया तो आगे चलकर बिहारी बड़े हैं या देव? का विवाद छिड़ा। इसी प्रकार हिन्दी साहित्य के आदिकाल को तो हिन्दी के दिग्गज आचार्य एवं इतिहासकार पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने सर्वाधिक विवादास्पद घोषित किया है, किन्तु अन्य काल भी विवादों से मुक्त नहीं हैं।
इस प्रकार हिन्दी में न जाने कितने विवाद उठे और बिना किसी निर्णय के ही धीरे-धीरे शान्त हो गये। शान्त होने का कारण यह नहीं है कि उनका समाधान मिल गया अपितु यह है कि विद्वानों ने असफल और निराश होकर उनसे मुंह मोड़ लिया। भले ही काल के अन्तराल के कारण इनमें से कुछ विवाद गौण हो गये हों किन्तु बहुत से ऐसे भी हैं जो आज भी उपयुक्त समाधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
प्रस्तुत पुस्तक में ऐसे ही कुछ विवादास्पद विषयों को लेकर उनके समाधान प्रस्तुत करने की चेष्टा की गयी है। लेखक नहीं कहता कि ये समाधान अन्तिम हैं, किन्तु इस बात का दावा वह अवश्य करता है कि ये नये हैं, मौलिक हैं। अब यह प्रबुद्ध पाठकों एवं विद्वानों का कार्य है कि इन समाधानों की संतुलित रूप में परीक्षा करें।

 About the Author/s 

डॉ. गणपतिचन्द्र गुप्त (1928 ई.) हिन्दी के यशस्वी साहित्यकार एवं समालोचक हैं। आपने क्रमशः पंजाब विश्वविद्यालय में प्रथम श्रेणी में एम.ए. (हिन्दी), पी.एच.डी. एवं डी. लिट्. की उपाधियाँ प्राप्त कीं। उन्होंने 1964 से 1978 ई. तक विभिन्न विश्वविद्यालयों में हिन्दी साहित्य का प्राध्यापन कार्य किया। 1974 ई. में पंजाब विश्वविद्यालय-स्नातकोत्तर अध्ययन केन्द्र, रोहतक के निदेशक पद पर प्रतिष्ठित हुए। तदनन्तर 1976 से 1978 ई. तक महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय, रोहतक में कुलानुशासक, अधिष्ठाता, भाषा-संकाय आदि पदों पर कार्य किया। 1978 ई. से 1984 तक हिमालय प्रदेश-विश्वविद्यालय, शिमला एवं कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में क्रमशः कुलपति के रूप में कार्य किया।
प्रकाशित मौलिक कृतियाँ ‘साहित्यिक निबन्ध’ (1959 ई.), ‘हिन्दी काव्य में श्रृंगार परम्परा और महाकवि बिहारी‘ (1960 ई.), ‘साहित्य-विज्ञान’ (1964 ई.), ‘हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास’ (1965 ई.), ‘आधुनिक साहित्य और साहित्यकार’ (1966 ई.), ‘बिहारी सतसईः वैज्ञानिक समीक्षा’ (1967 ई.), ‘महादेवीः नया मूल्यांकन’ (1968 ई.), ‘रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन’ (1971 ई.), ‘आदिकाल की प्रामाणिक रचनाएँ’ (1975 ई.), ‘हिन्दी साहित्यः परम्परागत विवाद एवं नये समाधान’, ‘हिन्दी साहित्येतिहासः परम्परागत दृष्टिकोण एवं नये सिद्धान्त’ आदि। विभिन्न रचनाओं पर आप सात राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं।
आपके द्वारा प्रतिपादित मौलिक सिद्धान्तों में ‘साहित्य की आत्माः आकर्षण शक्ति’, ‘साहित्य की विकास-प्रक्रिया’, ‘बौद्धिक-रस’ आदि उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त आपने ‘साहित्य-विज्ञान’, ‘साहित्येतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या’ आदि नये विषयों की भी स्थापना की है।

More Information
ISBN-139788126905645
AuthorGanpati Chandra Gupt
Weight0.5000
Original PriceINR 195
Publication Year1989
LanguageHindi
Pages154
PublisherAtlantic Publishers and Distributors (P) Ltd
SubjectHindi Literature
BindingHardbound
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